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Bhopal: celebrate Rachel Corrie’s life

March 15, 2014 2 comments

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American peace activist Rachel Corrie gave her life defending Palestinian homes from the Israeli army in Gaza in 2003. This Sunday, 16th March 2014, will be the 11th anniversary of her killing.

Here in Bhopal, next to the Union Carbide / Dow Chemicals factory responsible for the destruction of thousands of lives, we will be
celebrating Rachel’s life by reading aloud from her writings. In these she eloquently, compassionately and inspiringly describes injustice, oppression and inequality as well as hope and inspiration; as relevant in Bhopal as they were in Gaza. You are invited to join us in celebrating life, courage, compassion and a spirit of resistance.

Statue of the Bhopal Mother. Opposite Union Carbide factory.
4pm
Sunday 16th March 2014

*****

 

Israel was formed in Palestine by UN in 1948 so that Jews could have a safe country of their own. This was because 6 million Jews were killed during World War 2 in the Nazi Holocaust.

 

Most of the people already living in Palestine were not Jewish and they were forced from their homes or killed in order to make Israel. Since the beginning Israel has continued to expand its borders by fighting and displacing even more people.

 

Today there are 6 million Palestinian refugees. The West Bank and Gaza are Palestinian areas but they are under Israeli military control. Palestinians have to pass through Israeli checkpoints to travel between towns and villages. They are harassed, arrested and killed. Palestinian homes are still being destroyed. When they have demonstrations they are attacked with tear gas and guns.

 

Some Palestinians also fight and kill Israelis in retaliation. All killing of civilians is wrong. The vast majority of people killed are Palestinians, including many children. However the world governments and media do not report the truth so Israel is free to do as it likes without international sanctions.

 

Because of this violence and injustice international peace activists go to Palestine to take action to protect Palestinians and to report on what is happening.

 

In 2003 there were 8 of us from UK and USA in Gaza. On March 16th Israeli soldiers in tanks and bulldozers began clearing land near the houses of some friends of ours. We stood in the way of the bulldozers to protect their homes. For 3 hours the bulldozers and tanks tried to force us to leave by driving up and around us to scare us. Finally one bulldozer kept driving and ran over my friend Rachel Corrie from USA. She was crushed by the bulldozer while protecting the home of Dr Samir, a pharmacist. She died in my arms within an hour.

 

Rachel was 23 when she was killed but already had a profound understanding of the complex situation she was in as a white American in Gaza. Through the articulate emails that she wrote to her parents we can see both her deep sense of justice and her compassion, even for those soldiers who would eventually kill her.

 

This Sunday, 16th March 2014, the 11th anniversary of her death, here in Bhopal we will read aloud from her writings, because she no longer can. We will celebrate her life, her humour, her empathy, her courage and her vision, next to the Union Carbide / Dow Chemicals factory responsible for the death and destruction of thousands of lives here.

 

In both Gaza and Bhopal poor, apparently helpless communities are surviving despite the injustice and assaults on them from distant, unaccountable, powerful people who treat human lives as mere statistics. In both Gaza and Bhopal creativity, determination, strength and solidarity have grown hope and beauty from destruction and despair.

 

In celebrating Rachel’s life and words you are invited to also celebrate the human compassion, ingenuity and resilience that gives light in darkness and provides hope for the future worldwide.

 

 

जर्मनी, इटली और यूरोप के अन्य देशों में नाज़ी हुक्मरानों द्वारा दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान 60 लाख़ यहूदियों की ह्त्या की गई | इसी वजह से 1948 में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने फिलिस्तीन में इस्राइल राज्य  की स्थापना की ताकि यहूदियों को रहने के लिए सुरक्षित जगह मिले |  

 

फिलिस्तीन में पहले से रहनेवाले अधिकतर लोग यहूदी नहीं थे और इस्रायल राज्य की स्थापना के लिए उन्हें या तो ज़बरदस्ती हटाया गया या मार डाला गया |  इस्रायल राज्य की स्थापना के समय से ही यह लड़ाई के बल पर अपनी सीमा लगातार बढ़ा रहा है और लगातार लोगो को अपने घरों से विस्थापित कर रहा है | 

 

आज फिलिस्तीन में 60 लाख लोग बेघर हैं |  फिलिस्तीन के एक बड़े हिस्से वेस्ट बैंक और गाज़ा पर इस्रायल की सेना काबिज़ है | फिलिस्तीनियों को एक गाँव या शहर से दूसरे गाँव या शहर जाने के लिए इस्रायली सेना की निगरानी में अलग-अलग गेट से गुज़रना पड़ता है | ख़ासकर इन गेटों पर फिलिस्तीनियों को परेशान किया जाता है, गिरफ्तार किया जाता है या कभी-कभी मार डाला जाता है | आज भी फिलिस्तीनी लोगों के घर इस्रायल द्वारा तोड़े जा रहे हैं | जब फिलस्तीनी लोग इस अत्याचार का विरोध करते हैं तो उंन पर आँसू गैस के गोले छोड़े जाते हैं, गोलियां चलाई जाती हैं | 

 

कुछ फिलिस्तीनी बदले की भावना से इस्रायली जानें लेते हैं | आम इंसानों को मारना ग़लत है चाहे वह कहीं भी हो | कुल मिलाकर सबसे ज़्यादा फिलिस्तीनी ही मारे जाते हैं और मरनेवालों में बड़ी संख्या में बच्चे शामिल रहते हैं | लेकिन अलग अलग मुल्क़ों की सरकारों द्वारा और अख़बार या टेलीवीज़न में फिलिस्तीनियों पर जारी हिंसा की बात नहीं की जाती और इस्रायल बेक़सूर इंसानों के ख़िलाफ़ अत्याचार जारी रखने के लिए आज़ाद हो गया है |   

 

फिलिस्तीन में जारी इस अत्याचार से आम फिलिस्तीनियों की रक्षा करने के लिए दुनिया भर के शान्ति के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता वहाँ जाते हैं और बाकी दुनिया को फिलिस्तीन के लोगों की  हालत के बारे में बताते हैं | 

 

सन्-2003 में अमरीका और ब्रिटेन से हम 8 शान्ति कार्यकर्ता गाज़ा में थे | 16 मार्च के दिन इस्रायली सिपाहियों ने टैंकों और बुलडोज़रों से हमारे कुछ दोस्तों के घरों के आसपास ज़मीन साफ़ करना शुरू किया | बुलडोज़रों से अपने दोस्तों के घरों को बचाने के लिए हम उनके सामने खड़े हो गए | 3 घंटे तक कई टैंक और बुलडोज़र हमारे पास तक आके और हमारे आस-पास चलते हुए इस कोशिश में लगे रहे कि हम डर कर हट जाएँ | फिर इनमें से एक बुलडोज़र ने अमरीका से आई हुई मेरी दोस्त रैचेल कोरी को रौंद दिया | अपने दोस्त डाक्टर समीर के घर को बचाते हुए रैचेल बुलडोज़र के नीचे पिस गयी | घंटे भर के अंदर उसने मेरी बाँहों में दम तोड़ दिया | 

 

रैचेल जब मारी गयी तब वह सिर्फ 23 साल की थी पर उसे मालूम था कि एक गोरी महिला को उस जटिल परिस्थिति का मुक़ाबला कैसे करना चाहिए | उसने अपने माता-पिता को जो ईमेल भेजे थे उनसे पता चलता है कि वह इंसाफ़ के लिए कितनी बेचैन थी और उसे आम लोगों से कितनी हमदर्दी थी यहाँ तक कि उन सिपाहियों  से जिन्होंने आगे चलकर उसकी जान ले ली | 

 

कल, रविवार 16 मार्च को रैचेल के मौत की 11 वीं बरसी है |  कल, चूँकि रैचेल खुद हमें सुना नहीं सकती हम रैचेल की लिखी कविताएँ और चिट्ठियाँ पढ़ कर सुनाएँगे | कल यूनियन कार्बाइड के जिस कारख़ाने की वजह से हज़ारों लोग मारे और लाखों बीमार हुए उस कारख़ाने के सामने हम मिलकर रैचेल को  याद करेंगे, उसके चुटकुले, उसकी हमदर्दी, उसकी हिम्मत उसकी सोच आपस में बाँटेंगे | 

 

गाज़ा और भोपाल दोनों जगह ग़रीब और कमज़ोर वर्ग के लोग हैवानी ताकतों की नाइंसाफ़ी और अत्याचार के बावज़ूद ज़िंदा और ज़िंदादिल हैं | दोनों जगह रचनात्मकता, पक्की नीयत, हिम्मत और एकता से मायूसी और बर्बादी के माहौल में सम्भावना और सौंदर्य का सृजन हो रहा है जो पूरी दुनिया के भविष्य को रोशन करता है | 

 

 

 

दिन : रविवार 16  मार्च 2014 

समय : शाम 4 बजे   

जगह : युनियन कार्बाइड कारखाने के सामने मूर्ति के पास 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Israel was formed in Palestine by UN in 1948 so that Jews could have a safe country of their own. This was because 6 million Jews were killed during World War 2 in the Nazi Holocaust.

 

जर्मनी, इटली और योरोप के अन्य देशों में नाज़ी हुक्मरानों द्वारा दुसरे विश्वयुद्ध के दौरान 60 लाख यहूदियों की ह्त्या की गई | इसी वजह से 1948 में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने फिलस्तीन में इस्रायल राज्य कि स्थापना की ताकि यहूदियों को रहने के लिए सुरक्षित जगह मिले |

 

Most of the people already living in Palestine were not Jewish and they were forced from their homes or killed in order to make Israel. Since the beginning Israel has continued to expand its borders by fighting and displacing even more people. 

 

फिलस्तीन में पहले से रहनेवाले अधिकतर लोग यहूदी नहीं थे और इस्रायल राज्य की स्थापना के लिए उन्हें या तो ज़बरदस्ती हटाया गया या मार डाला गया |  इस्रायल राज्य की स्थापना के समय से ही यह लड़ाई के बल पर अपनी सीमा लगातार बढ़ा रहा है और लगातार लोगो को अपने घरों से विस्थापित कर रहा है | 

 

Today there are 6 million Palestinian refugees. The West Bank and Gaza are Palestinian areas but they are under Israeli military control. Palestinians have to pass through Israeli checkpoints to travel between towns and villages. They are harassed, arrested and killed. Palestinian homes are still being destroyed. When they have demonstrations they are attacked with tear gas and guns.

 

आज फिलस्तीन में 60 लाख लोग बेघर हैं |  फिलस्तीन के एक बड़े हिस्से वेस्ट बैंक और गाज़ा पर इस्रायल की सेना काबिज है | फिलस्तीनियों को एक गाँव या शर से दुसरे गांव या शहर जाने के लिए इस्रायली सेना की निगरानी में अलग अलग गेट से गुज़रना पड़ता है | खासकर इन गेटों पर फिलस्तीनियों को परेशान किया जाता है, गिरफ्तार किया जाता है या कभी कभी मार डाला जाता है | आज भी फिलस्तीनी लोगों के घर इस्रायल द्वारा तोड़े जा रहे हैं | जब फिलस्तीनी लोग इस अत्याचार का विरोध करते हैं तो उंन पर आंसू गैस के गोले छोड़े जाते हैं, गोलियां चलाई जाती हैं | 

 

Some Palestinians also fight and kill Israelis in retaliation. All killing of civilians is wrong. The vast majority of people killed are Palestinians, including many children. However the world governments and media do not report the truth so Israel is free to do as it likes without international sanctions.

 

कुछ फिलस्तीनी बदले की भावना से इस्रायली जाने लेते हैं | आम इंसानों को मारना गलत है चाहे वह कहीं भी हो | कुल मिलाकर सबसे ज़्यादा फिलस्तीनी ही मारे जाते हैं और मरनेवालों में बड़ी संख्या में बच्चे शामिल रहते हैं | लेकिन अलग अलग मुल्कों की सरकारों द्वारा और अखबार या टेलीवीज़न में फिलस्तीनियों पर जारी हिंसा की बात नहीं की जाती और इस्रायल बेक़सूर इंसानों के खिलाफ अत्याचार जारी रखने के लिए आज़ाद हो गया है | 

 

Because of this violence and injustice international peace activists go to Palestine to take action to protect Palestinians and to report on what is happening.

 

फिलस्तीन में जारी इस अत्याचार से आम फिलस्तीनियों की रक्षा करने के लिए दुनिया भर के शान्ति के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता वहाँ जाते हैं और बाकी दुनिया को फिलस्तीन के लोगों की  हालत के बारे में बताते है | 

 

In 2003 there were 8 of us from UK and USA in Gaza. On March 16th Israeli soldiers in tanks and bulldozers began clearing land near the houses of some friends of ours. We stood in the way of the bulldozers to protect their homes. For 3 hours the bulldozers and tanks tried to force us to leave by driving up and around us to scare us. Finally one bulldozer kept driving and ran over my friend Rachel Corrie from USA. She was crushed by the bulldozer while protecting the home of Dr Samir, a pharmacist. She died in my arms within an hour.

 

सन 2003 में अमरीका और ब्रिटेन से हम 8 शान्ति कार्यकर्ता गाज़ा में थे | 16 मार्च के दिन इस्रायली सिपाहियों ने टैंकों और बुलडोज़रों से हमारे कुछ दोस्तों के घरों के आसपास ज़मीन साफ़ करना शुरू किया | बुलडोज़रों से अपने दोस्तों के घरों को बचाने के लिए हम उनके सामने खड़े हो गए | 3 घंटे तक कई टैंक और बुलडोज़र हमारे पास तक आके और हमारे आस पास चलते हुए इस कोशिश में लगे रहे कि हम डर कर हट जाँय | फिर इनमे से एक बुलडोज़र ने अमरीका से आई हुई मेरी दोस्त रैचेल कोरी को रौंद दिया | अपने दोस्त डाक्टर समीर के घर को बचाते हुए रैचेल बुलडोज़र के नीचे पिस गयी | घंटे भर के अंदर उसने मेरे बाँहों में दम तोड़ दिया | 

 

Rachel was 23 when she was killed but already had a profound understanding of the complex situation she was in as a white American in Gaza. Through the articulate emails that she wrote to her parents we can see both her deep sense of justice and her compassion, even for those soldiers who would eventually kill her.

 

रैचेल जब मारी गयी तब वह सिर्फ 23 साल की थी पर उसे मालूम था कि एक गोरी महिला को उस जटिल परिस्थिति का मुकाबला कैसे करनी चाहिए | उसने अपने माता पिता को जो ईमेल भेजे थे उनसे पता चलता है कि वह इन्साफ के लिए कितनी बेचैन थी और उसे आम लोगों से कितनी हमदर्दी थी यहाँ तक कि उन सिपाहियों  से जिन्होंने आगे चलकर उसकी जान ले ली | 

 

This Sunday, 16th March 2014,the 11th anniversary of her death, here in Bhopal we will read aloud from her writings, because she no longer can. We will celebrate her life, her humour, her empathy, her courage and her vision, next to the Union Carbide / Dow Chemicals factory responsible for the death and destruction of thousands of lives here.

 

कल, रविवार 16 मार्च को रैचेल के मौत की 11 वीं बरसी है |  कल, चूंकी रैचेल खुद हमें सूना नहीं सकती हम रैचेल की लिखी कवितायेँ और चिट्ठियाँ पढ़ कर सुनाएंगे | कल युनियन कार्बाइड के जिस कारखाने की वजह से हज़ारों लोग मारे और लाखों बीमार हुए उस कारखाने के सामने हम मिलकर रैचेल को  याद करेंगे, उसके चुटकुले, उसकी हमदर्दी, उसकी हिम्मत उसकी सोच आपस में बाँटेंगे | 

 

In both Gaza and Bhopal poor, apparently helpless communities are surviving despite the injustice and assaults on them from distant, unaccountable, powerful people who treat human lives as mere statistics. In both Gaza and Bhopal creativity, determination, strength and solidarity have grown hope and beauty from destruction and despair.

 

In celebrating Rachel’s life and words you are invited to also celebrate the human compassion, ingenuity and resilience that gives light in darkness and provides hope for the future worldwide.

 

गाज़ा और भोपाल दोनो जगह गरीब और कमज़ोर वर्ग के लोग हैवानी ताकतों के नाइंसाफी और अत्याचार के बावज़ूद ज़िंदा और ज़िंदादिल हैं | दोनों जगह रचनात्मकता, पक्की नीयत, हिम्मत और एकता से मायूसी और बर्बादी के माहौल में सम्भावना और सौंदर्य का सृजन हो रहा है जो पूरे दुनिया के भविष्य को रौशन करता है | 

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Dhoom 3 – fun and great twist on white James Bond using non white countries as exotic playground

December 26, 2013 1 comment

Dhoom 3 was amazing! Such a good movie. Really high production values and lots of fun. I think as my first Bollywood film it may have set future expectations unrealistically high. And the big baddie was a white corporate exec called Warren Anderson! Surely it can’t be a coincidence that this is exactly shared with Union Carbide’s chief exec, himself responsible for the corporate manslaughter of thousands here in Bhopal?!

USA was used as the exotic backdrop and the white cops were kinda dumb and useless and needing the assistance of the smart (in all senses of the word) Indian cops. It was the Indians who had the fancy moves during the chase scenes and the white cops who had the big smash ups. In fact apart from one white character (and she could speak Hindi) the white guys were either dumb or evil. But after decades of the reverse (eg this year’s “Captain Phillips”) this seemed just!

In particular a river chase scene invoked all those James Bonds where river boats are ripped through – but this time its brown guys using a white city as a playground. Somehow I enjoyed that. And I really like that unapologetic self-confidence rather than the internalised-racism self-cringe.

I thought my initial 2 days of travel plus jet lag had intensified and clouded my emotions and so biased my love-at-first-sight reaction to even Mumbai airport, but no, its getting deeper every day. I became unmotivated to learn any more Hindi last week as it won’t be useful after I travel south next month, but I’ve picked it up again this week (today I learned to (sort of / badly) count to 100) because I think I will come back here, to Bhopal. And so much of the north to see I will have to make at least one more trip to this gorgeous country.

Also on the way home and still feeling invigorated from the movie, I got my hair cut right back – I’d let it grow to about an inch so it would be less shocking out here. But after a fortnight I realised that the best thing I can do is wear Indian clothes, which anyway are gorgeous. I am white and that is enough to get stared at off the beaten track. I can’t fade into comfortable background however long my hair gets, so I might as well have the hairstyle I want! India is very diverse so can probably handle this weird chick with shaved head. So I went into a barber’s, showed him a photo of me with a shorn head (I long ago learned that I will otherwise get disbelief that I understand what I am asking for) and now am again bald. :)

Endnote : the gender politics in D3 were pretty standard – female characters pretty and used for love interest and eye candy. Please don’t go see this movie thinking its particularly progressive. I just enjoyed it that’s all.